Tuesday, 1 February 2011

सच्चा मुक्तिदाता


बात उस समय की है जब गुरू नानक देव जी अपने परम शिष्य मरदाना के साथ अपनी पूर्वी भारत की यात्रा के दौरान बनारस एवं नानकमता में शांति का संदेश प्रस्तुत करने के पश्चात आगे बढ़ रहे थे। तभी रास्ते में एक जगह उनकी मुठभेड़ डाकुओं के साथ हुई। डाकू उन्हें देख कर बोले,"जिसके मुख पर इतनी ज्योति है सो आध्यात्मिक तौर पर खाली नहीं। परंतु लोगों को मार कर उन्हें ठग लेना ही हमारा व्यवसाय है।" तब वे गुरू नानक देव जी के चारों ओर उन्हें घेर कर खड़े हो गये।
गुरू जी का दर्शन करते ही वे मानो अंदर से निर्बल हो गये।
गुरू जी ने उनसे पूछा,"तुम कौन हो?"
उत्तर में उन्होंने कहा,"हम ठग हैं और तुम्हें मारने आये हैं।"
गुरू महाराज ने कहा,"अच्छा होगा अगर तुम एक काम संपन्न करके हमें मारो।"
तब उन्होंने कहा,"काम क्या है?"
गुरू जी ने उन्हें समझाते हुए कहा,"वह दूर जो धुआँ नज़र आ रहा है, वहाँ से आग लाकर हमें मार डालना।"
डाकुओं ने कहा,"कहाँ आग कहाँ हम, अभी मार कर इन्हें लूट लेना चाहिए।"
तब उनमें से एक ने कहा,"हमने बहुत लोगों की हत्या की है, परंतु हँस कर किसी ने नहीं कहा कि उन्हें मार डाला जाए।"
तब उनमें से कुछ डाकु वहाँ से आग लाने दौड़े। जब वे वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि वहाँ एक चिता जल रही है, और देवगण एवं यमगण वहाँ खड़े झगड़ रहे हैं।
तब ठगों ने उनसे पूछा,"आप कौन हैं और यहाँ खड़े झगड़ क्यों रहे हैं?"
उत्तर देते हुए उन्होंने कहा,"हम यमगण हैं और परमेश्वर की आज्ञानुसार इस जीव को कुंभी नर्क में ले चले हैं। परंतु हमारे पीछे ये देवगण आए हैं औए इसे हमसे छीन कर ले जा रहे हैं। तुम ही इअनसे पूछो कि ये ऐसा क्यों कर रहे हैं।"
तब ठगों ने देवगणों से पूछा,"आप इस जीव को इनके पास से छीनकर क्यों ले जाना चाहते हैं?"
देवगणों ने उत्त्र दिया,"यह महापापी पुरुष था, पर जिस गुरू परमेश्वर को तुम मारने आये हो, उसकी दृष्टि इसकी चिता के धुएँ पर पड़ी है। जिस कारण इसे बैकुँठ प्राप्त हुआ है।"
यह सुनते ही डाकु वहाँ से दौड़ आये और अपने बाकी साथियों के सामने भी इस बात को प्रकट किया,"यह तो महापुरुष है। जिस की दृष्टि चिता के धुएँ पर पड़ने से भी जीव मुक्त हो जाता है उसको मारने की बात भी हम कैसे सोच सकते हैं?" ऐसा कहते हुए वे गुरू नानक देव जी की चरणवंदना करते हुए बोले,"गुरू साहिब, हमने घोर पाप कमाये हैं। हमारे पापों का विनाश करके हमारे हृदय में प्रभु का नाम बसा दें।"
गुरू साहिब ने प्रसन्न होकर कहा,"तुम्हारे पाप तब ही विनाश हो सकेंगे जब आप इस दुष्कर्म का त्याग करके किसी अच्छे कर्म को अपना लेंगे। जो कुछ भी तुमने दूसरों से लूटा है उसे ज़रूरतमंदों में बाँट दिया जाए।"
इसके उपरंत गुरू साहिब ने उपदेश किया,"बहुत लोग प्रभु का भजन तो करते हैं लेकिन वे धर्म के मूल भाव को नहीं पहचानते। जो मनुष्य परिश्रम के साथ कमाई करके खुद खाते हैं तथा ज़रूरतमंदों को भी उस कमाई में से दान करते हैं उन्होंने ही सही अर्थों में धर्म के रास्ते को पहचाना है।"
इस प्रकार उनका उद्धार करने के पश्चात गुरू नानक देव जी वहाँ से चल पड़े।

No comments:

LOVE OF GOD

LOVE OF GOD
KNOW YOUR SAVIOUR